संवाददाता – रुद्र किंकर, मार्गदर्शक न्यूज, नई दिल्ली : वर्ल्ड पीस हार्मोनी के चेयरमैन डॉ. शकील सैफी ने देश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व तथा प्रधानमंत्री पद की संवैधानिक गरिमा को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि भारत का प्रधानमंत्री पद किसी दल विशेष या व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।
डॉ. सैफी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के उस वक्तव्य का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने यह आशंका जताई थी कि विपक्ष के कुछ सांसद प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंच सकते थे, जिससे किसी अप्रत्याशित घटना की संभावना बन सकती थी। डॉ. सैफी ने कहा कि यह बयान केवल एक संसदीय टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं और राजनीतिक मर्यादाओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है। इसे हल्के में लेना न तो लोकतंत्र के हित में है और न ही देश की सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री केवल किसी दल का नेता नहीं होता, बल्कि वह 140 करोड़ नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधि और देश का संवैधानिक मुखिया होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्पष्ट और प्रचंड जनादेश के साथ इस पद पर आसीन हैं। ऐसे में उनकी सीट तक जबरन पहुंचने की आशंका न केवल शिष्टाचार का उल्लंघन है, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं पर भी आघात है।
डॉ. सैफी ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध, आलोचना और बहस का अधिकार सभी को है। विपक्ष की भूमिका लोकतंत्र को मजबूत बनाती है, लेकिन विरोध और अराजकता के बीच एक स्पष्ट सीमा होती है। यदि संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच पर मर्यादाएं टूटती हैं, तो समाज में संयम और अनुशासन की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर एक आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत की है। राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक सुधार, डिजिटल सशक्तिकरण और सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में स्पष्ट दिशा दिखाई देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक शक्तियां वैचारिक असहमति के स्थान पर भाषा और व्यवहार की मर्यादा को त्यागती दिखाई दे रही हैं।
वर्ल्ड पीस हार्मोनी का मानना है कि शांति केवल सीमाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थानों के भीतर भी आवश्यक है। संसद में विचारों का टकराव स्वाभाविक है, लेकिन हिंसा, अराजकता या सुरक्षा जोखिम लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। यह केवल किसी एक व्यक्ति की सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की निरंतरता से जुड़ा विषय है।
डॉ. सैफी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने हमेशा संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास जताया है। संसद को नीति-निर्माण का सर्वोच्च मंच माना है, लेकिन संवाद तभी संभव है, जब वातावरण विश्वास, मर्यादा और जिम्मेदारी से भरा हो।
उन्होंने कहा कि आज देश के सामने यह प्रश्न है कि वह विकास और विचारों की राजनीति चाहता है या शोर, अपमान और अस्थिरता की राजनीति। विपक्ष से अपेक्षा है कि वह सरकार की आलोचना करते हुए भी संविधान और संसद की गरिमा को सर्वोपरि रखे। असहमति लोकतंत्र को मजबूत करती है, जबकि अराजकता उसे कमजोर करती है। प्रधानमंत्री के सम्मान और सुरक्षा में खड़ा होना किसी दल का समर्थन नहीं, बल्कि संविधान, संसद और लोकतंत्र की रक्षा है।
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