- के.पी. कॉलेज मुरलीगंज बना वैश्विक विज्ञान का मंच, अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में भविष्य की तकनीकों पर मंथन
- सतत विकास, ग्रीन केमेस्ट्री, नैनो टेक्नोलॉजी और मेडिकल रिसर्च पर अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने साझा किए विचार
संवाददाता — रुद्र किंकर, मार्गदर्शक न्यूज
मुरलीगंज (मधेपुरा)। आमतौर पर छोटे शहर शांत शैक्षणिक गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन शनिवार को मुरलीगंज स्थित के.पी. कॉलेज अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक विमर्श का केंद्र बनकर उभरा। रसायन विभाग, के.पी. कॉलेज, मुरलीगंज (बिहार) एवं भारतीय रसायन सोसायटी, भागलपुर शाखा के संयुक्त तत्वावधान में “सतत विकास और वैश्विक नवाचार में भविष्य के रुझान” विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन 07 फरवरी 2026 को शोध, नवाचार और अकादमिक संवाद का व्यापक समागम देखने को मिला।
वैज्ञानिक सत्र तृतीय की संयुक्त अध्यक्षता प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. एन.बी. सिंह एवं प्रो. प्रनेश चौधरी ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय के प्रधानाचार्य एवं संगोष्ठी संयोजक प्रो. अशोक कुमार झा द्वारा अतिथियों के औपचारिक स्वागत से हुआ। अतिथियों को पुष्पगुच्छ, शॉल एवं स्मृति-चिह्न प्रदान किए गए। स्वागत अवसर पर संगीत विभागाध्यक्ष डॉ. श्यामा कुमार भारती द्वारा प्रस्तुत स्वागत गीत ने पूरे सभागार को भावविभोर कर दिया।
संगोष्ठी के सह-संयोजक डॉ. ऊषा शर्मा एवं डॉ. अभिजीत कुमार ने मंच संचालन किया, जबकि आयोजन सचिव डॉ. विजय कुमार पटेल एवं डॉ. गरिमा त्रिपाठी ने कार्यक्रम की व्यवस्थाओं का सफल संचालन सुनिश्चित किया। सीमित संसाधनों में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम ने महाविद्यालय की संगठन क्षमता को प्रभावी ढंग से प्रदर्शित किया।
भविष्य की तकनीकों पर अंतरराष्ट्रीय शोध प्रस्तुत
वियना विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रिया के डॉ. गौरव गांगुली ने सूर्य के प्रकाश को सतत ऊष्मा के रूप में संग्रहित करने की नवीन तकनीकों पर अपना शोध प्रस्तुत किया। उन्होंने आणविक सौर-तापीय बैटरियों की संभावनाओं और स्वच्छ ऊर्जा को भविष्य की अनिवार्यता बताया।
आईआईटी खड़गपुर की प्रो. अंजली पाल ने ग्रीन केमेस्ट्री के अंतर्गत आयनिक रंजकों की पुनर्प्राप्ति पर आधारित अपने शोध को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
प्रो. ताराशंकर पाल ने साइनाइड के साथ रेडॉक्स रसायन के वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए नैनो प्रैक्टिकल्स की उपयोगिता पर चर्चा की। वहीं यूके स्थित सेंटर ऑफ एनालिटिकल बायोसाइंस, नॉटिंघम से जुड़े डॉ. राकेश रौशन झा ने जैवसक्रिय लिपिड को दर्द और सूजन के उपचार में संभावित चिकित्सीय लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया।
आईआईएससी, बेंगलुरु के प्रो. श्रीनिवासन नटराजन ने ठोस-अवस्था पदार्थों एवं खनिज संरचनाओं पर आधारित अपने शोध में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक उन्नति का उल्लेख किया। इसके पश्चात शोधार्थियों द्वारा पोस्टर प्रेजेंटेशन प्रस्तुत किए गए, जिसमें युवा वैज्ञानिकों की रचनात्मकता स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
चौथे सत्र में नवाचार और अनुप्रयोग पर चर्चा
वैज्ञानिक सत्र चतुर्थ की अध्यक्षता प्रो. एस. नटराजन ने की। जर्मनी के रेगेन्सबर्ग विश्वविद्यालय के प्रो. बुरखार्ड कोनिग ने प्रकाश-सहायता प्राप्त कार्बनिक संश्लेषण तकनीकों पर व्याख्यान दिया।
मुंगेर विश्वविद्यालय के डॉ. दीवान अकरम ने वनस्पति तेलों से विकसित संक्षारणरोधी कोटिंग सामग्री को उद्योगों के लिए पर्यावरण अनुकूल विकल्प बताया।
टी.एम.बी.यू., भागलपुर की डॉ. गरिमा त्रिपाठी ने नवीन जैव-सक्रिय यौगिकों की चिकित्सीय संभावनाओं पर प्रकाश डाला, जबकि आईआईटी पटना के डॉ. सुजॉय कुमार सामंता ने सस्टेनेबल डेवलपमेंट, प्रदूषण नियंत्रण एवं वेस्टवाटर ट्रीटमेंट पर विस्तृत जानकारी दी। एमजीसीयू, मोतिहारी के डॉ. अभिजीत कुमार ने दुर्लभ आनुवंशिक रोगों के संभावित उपचार पर आधारित शोध प्रस्तुत किया।
सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ समापन
प्रधानाचार्य प्रो. अशोक कुमार झा ने अध्यक्षीय संबोधन में शिक्षा एवं अनुसंधान के समन्वय पर बल दिया। रसायन शास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार पटेल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। सभी वक्ताओं एवं प्रतिभागियों को सहभागिता प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।
संगोष्ठी का समापन सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ हुआ, जिसमें छात्रों की प्रस्तुतियों ने विज्ञान और संस्कृति के समन्वय को जीवंत रूप दिया।
इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ने यह स्पष्ट कर दिया कि छोटे शहरों के शैक्षणिक संस्थान भी अब वैश्विक अकादमिक विमर्श में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। के.पी. कॉलेज, मुरलीगंज का यह आयोजन न केवल शोध और नवाचार का मंच बना, बल्कि युवाओं को विज्ञान के माध्यम से भविष्य गढ़ने की प्रेरणा भी दे गया।

